Tuesday, June 28, 2011

संतान का कर्तव्य,(मातृ -पितृ भक्त पुण्डरीक की कथा)

माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः |
बान्धावा विश्नुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम ||
हमारे ग्रंथो में माता पिता को लक्ष्मी नारायण का स्वरूप माना  गया है|
अत:पुत्र का कर्तव्य है की वह माता पिता की सेवा में लगा रहे | असली पुत्र वे  होते है, जो  शरीर आदि को अपना नहीं मानते,प्रत्युत माता पिता का ही मानते है;क्योकि शरीर माता पिता से ही पैदा हुआ है ,मनु जी ने भी कहा  है कि पुत्र तीर्थ,व्रत ,भजन, स्मरण,आदि जो शुभ कार्य करे,वह सब माता पिता को ही अर्पण करे|

तेषामानुपरोधेन  पारत्रयं  यध्यदाचरेत | 
तत्तत्रिवेदयेत्तेभ्यो           मनोवचनकर्मभिः||         (मनुस्मृति  २ | २३६ )

माता पिता जीवित हो तो तत्परता से उनकी आज्ञा का पालन करे,उनके चित्त कि प्रसन्नता ले और मरने के बाद उनको पिंड पानी दे,श्राद्ध तर्पण करे,उनके नाम से तीर्थ व्रत आदि करे| ऐसा करने से उनका आशीर्वाद मिलता है|
श्री भीष्म ने पिता की सुख सुविधा,प्रसन्नता के लिए अपनी सुख सुविधा का त्याग कर दिया और आबाल ब्रम्हचारी रहने की प्रतिज्ञा ले ली |
श्री  राम ने स्वयं कहा है कि पिता जी के कहने से मै आग में भी प्रवेश कर सकता हूँ,विष का भी भक्षण कर सकता हूँ,और समुद्र में भी कूद सकता हूँ पर मै पिता कि आज्ञा नहीं टाल सकता हूँ |

अहं  हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके | 
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं  पतेयमपि चार्णवे ||           (वाल्मीकि रामायण )

गोस्वमी तुलसी दास ने भी कहा है -

अनुचित उचित बिचारू तजि जे पालहि पितु बैन |
ते भाजन सुख सुजस के बसहि अमरपति ऐन ||

उपनिषदों में भी आता है कि  मातृदेवो भव.पितृ देवो भव |

माता पिता कि सेवा के संदर्भ में ए़क कथा आती है

पुण्डरीक  ने तन मन से तत्परता पूर्वक माता पिता की सेवा की,

उसकी सेवा से प्रसन्न होकर भगवान बिना बुलाए हि पुण्डरीक के घर आ गए और बोले - " पुण्डरीक ! तेरी माता पिता कि भक्ति से प्रसन्न होकर मै स्वयं  तेरे पास तेरे को दर्शन देने आया हूँ |"
पुण्डरीक उस समय माता पिता की  सेवा में लगे हुए थे;अतः बे भगवान से बोले - "माता पिता की जिस सेवा के कारण आप यहाँ मुझे दर्शन देने आये है,उस सेवा को मै क्यों छोंडू ? अभी मै माता पिता की  सेवा में  लगा हुआ हूँ ; सेवा पूरी होने पर ही  मै आपके दर्शन कर सकता हूँ; तब तक आप रुकना चांहे तो इन ईंटो पर खड़े हो जांए |" 
ऐसा कह कर पुण्डरीक ने दो ईंटों को पीठ के पीछे फ़ेंक दिया भगवान उन पर खड़े हो गए, तभी से भगवान का नाम विट्ठल पड़ गया |
भगवान के इस रूप का दर्शन कोई करना चाहे तो पंडरपुर (महाराष्ट) में क्र सकता है|






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